Thursday, 8 December 2011

Hussain(a.s.) “Muhafiz-e-Islam hi Nahi Muhafiz-e-Insaaniyat Bhi Hai” by Farhat Durrani


हुसैन (a.s.) “मुहाफ़िज़-ए-इस्लाम ही नहीं, मुहाफ़िज़-ए-इंसानियत भी है” by Farhat Durrani November 29, 2011

निज़ामे कुदरत के राज़ समझना इंसान के बस के बहार है. खिल्क़ते काएनात और इंसानी खिल्क़त के साथ ही इस जहाँ की तारिख में हजारों तहजीबें और वाकेयात रुनुमाँ होते रहे और होते ही रहेंगे. इंसान ने अपनी अक्ल ke हिसाब से वक़्त दर वक़्त अपनी तहजीबों को जन्म दिया. आज हमारे सामने कई तरह के फलसफे और तारीखें हैं जिनको पढने और समझने के बाद हम इस दुनिया की तारिख को एक कोशिश ही भर समझ सकते हैं. अल्लाह ने कुरान में इस काएनात की खिल्क़त के कई राजों पर से पर्दा उठाया है. कुरान में आदम से ले कर सरकार-ए-दो आलम (सवाव) तक के तमाम वाकेयात और तहजीबों का ज़िक्र है. और इंसानी ज़िन्दगी को एक बेहतरीन तरीके से गुज़ारने का पैग़ाम दिया है जो की मज़हबी इस्लाम है.

यानी कुरान इंसानी ज़िन्दगी को बेहतरीन तरीके से जीने का एक रास्ता दिखाता है और यही रास्ता अस्ल मज़हब-ए-इस्लाम है. लेकिन आअज मुसलमान या इस्लाम का नाम सुनते ही किसी गैर मुस्लिम या मुख्तलिफ मज़हब और तहजीब के लोगों के ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती है वो या तो किसी दहशत गर्द कि या जुंग, खूंरेज़ी, धमाके, अगवा, क़त्ल तनाजे के अलावा शायद ही कोई और शै हो. इसका ज़िम्मेदार कौन है? इसके ज़िम्मेदार खुद मुसलमान हैं. जिन्होंने दुनिया के सामने सच्छे और अल्लाह के नेक लोगों को अपना Ideal बनाने के बजाये हमलावर, ज़ालिम और गासिब बादशाहों को इस्लाम का पेशवा और रहनुमा बनाकर पेश किया. इन्होने रसू (सवाव) कि रेहलत के बाद बजाये उनके पैगाम पे अमल करने के उन्ही के घरवालों पे मज़ालिम शुरू कर दिए और इक्तेदार और मुलुकियात कि हवास में पड़ गये. ये मज़ालिम खुद हज़रात अली a.s. से शुरू करके उनकी औलाद और बाद में शिआन-ए-अली as पे किये जाते रहे और मुसलसल हो रहे हैं. अगर मुसलमान इससे गुरेज़ करते और पैगाम-ए-रसूल सवाव और ऐले रसूल a.s. को दुनिया के सामने पेश करते तो आज इस्लाम के नाम पे ये खौफ-ओ-हेरस ना होता.

न जाने क्या दौर आ गया है. इस अज़ीम मज़हब कि तबलीग में जो कुर्बानियां दी गयीं क्या वो इसी दिन के लिए थीं? आज कुरान कि तस्वीर Klashinkov Riffles के दरमियान नश्र कि जा रही है. खाना-ए-काबा को इन्तेहापसंद तंज़ीमें अपनी निशान कि शक्ल में दिखा रही हैं. अल्लाह का नाम लेकर लोगों के सर कलम किये जा रहे हैं. क्या नामनेहाद मुसलमां ये सब करके इस्लाम का सही मकसद हासिल कर पायेंगे? क्या इससे इस्लाम कि तबलीग होगी? नहीं बिलकुल नहीं. इससे मानफी असरात पैदा हो रहे हैं. आज ज़रूरत ये है कि दुनिया को इस्लाम कि अस्ल तस्वीर दिखाई जाये. एक बहुत बड़े mission कि ज़रुरत है. और ये काम वही सच्चा मुसलमां कर सकता है जिसके दिल में दीन के लिए मोहब्बत हो. दुनिया के सामने इस्लाम कि सच्ची तस्वीर पेश करना होगी. दुनिया को बताना होगा कि इस्लाम ज़ुल्म का मज़हब नहीं है बल्कि इस्लाम सब्र और क़ुरबानी का मज़हब है. आज के नामनेहाद मुसलमां Laden और Saddam जैसे दहशतगर्दों को अपना Ideal बना कर जब दुनिया के सामने पेश करेंगे तो इस्लाम कि क्या तस्वीर दुनिया के सामने जाएगी.

ज़रुरत है तारिख-ए-इस्लाम के ऐसे किरदार सामने लाने कि जिनकी ज़िन्दगी से दुनिया के हर फर्द, हर मज़हब, हर इलाके, हर फिरके और हर उम्र के लोगों को पैघाम दिया जा सके. और इस तरह के किरदार सिवाए कर्बला के और कहीं नहीं मिलते. कर्बला में इमाम हुसैन as. और उनके साथियों ने हर उम्र और तकरीबन हर गोशे के इंसानों कि नुमाएंदगी कि और एक पैगाम दिया. कर्बला एक मुकम्मल canvas है जिससे ता क़यामत हर इंसान अपने लिए पैगाम हासिल कर सकता है. इंसानियत का पैगाम, सब्र का पैघाम, भाईचारे का पैगाम, ईसार का पैगाम, कुर्बानी का पैगाम, सच का पैघाम, बहादुरी का पैगाम. आखिर क्या कुछ नहीं है कर्बला में. इमाम हुसैन a.s. ने कर्बला से इस दुनिया को हर वो चीज़ अता कि है जिससे ज़िन्दगी को बेहतर बनाया जा सके. कर्बला सिर्फ इस्लाम के लिए नहीं है, बल्कि कर्बला तो सारी दुनिया के लिए एक institution है. जैसे हज़रत हर्र a.s. का वाकया इसकी मिसाल है. हर्र इमाम हुसैन a.s. को घेरने के मकसद से आया था. लेकिन जब इमाम ने देखा कि उसका लश्कर प्यासा है तो अपने लश्कर से उसको और उसके तमाम साथियों को पानी पिलवाया. यहाँ तक कि हर्र के लश्कर के जानवरों तक को सेराब किया. इमाम जानते थे कि ये दुश्मन है और घेरने आया है, लेकिन इंसानियत कि मेराज देखिये कि मौला ने उसको पानी पिलाया. ये कोई मामूली वाकया नहीं है. तारीख में इसकी मिसाल नहीं मिलती.

और इस वाकये का नतीजा ये हुआ कि वही हर्र 10 मुहर्रम को यज़ीद कि फ़ौज छोड़कर इमाम हुसैन a.s. के साथियों में शामिल हो गया और इमाम के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. यहाँ इमाम ने किसी जब्र या ज़बरदस्ती से हर्र को अपने साथ नहीं किया, बल्कि अपने किरदार से हर्र को अपना बनाया. इमाम हुसैन a.s. ने दुनिया को एक पैगाम दिया कि कैसे दुश्मन को तलवार से नहीं बल्कि किरदार से जीता जाता है. आज हम इतने ख़ुदगर्ज़ हो गये हैं कि सिर्फ अपने फाएदे कि ही बात सोंचते हैं. अपने पडोसी तक का ख्याल नहीं रखते लेकिन इमाम हुसैन a.s. ने अपने दुश्मन तक के लिए ऐसा सुलूक पेश किया कि आज लोग अपने दोस्तों के लिए ये ना करें. ये सिर्फ एक कर्बला के अज़ीम वाकये का एक छोटा सा गोशा है. कर्बला तो हर उम्र के लोगों के लिए पैगाम देती है. 6 महीने के अली असग़र a.s. से ले कर बुज़ुर्ग हबीब इब्ने मज़ाहैर a.s. ने अपने किरदार से सच और सब्र का पैगाम दिया. इन लोगों ने अपनी कुर्बानियां सिर्फ हक़ के लिए पेश कीं. इमाम हुसैन a.s. ही हक़ थे. उनके मुकाबले पे बतील था. और अगर इंसान ये समझ ले और ये यक़ीन कर ले कि वो हक़ पर है तो उसको दुनिया कि कोई ताक़त खौफ़ज़दा नहीं कर सकती. यही वजह है इमाम हुसैन a.s. कि क़यादत में छोटे छोटे बच्चों ने अपनी जानो ki कुर्बानियां हँसते हँसते पेश कर दीं. लेकिन बतील के आगे नहीं झुके. मुक़ाबले पे ज़ालिम बादशाह था और उसकी लाखों कि फ़ौज थीं. लेकिन इमाम हुसैन a.s. के साथियों को इसका यकीन था कि वो हक पे हैं और अगर हक़ के लिए जान भी चली जाये तो इसकी परवाह नहीं.

लेकिन आज का मुसलमां अपने ज़ाती मफ़ाद और अपनी मुलूकियत और इक्तेदार के लिए और अपनी मनफी सोंच को दूसरों पे थोपने के लिए इस्लाम के नाम का सहारा ले कर इस अज़ीम मज़हब को ज़ख़्मी कर रहा है. ये गुनाह-ए-अज़ीम है. तारिख-ए-कर्बला देखी जाये तो वहां ऐसे मुसलमां मिलेंगे जिन्होंने अपने सीने और अपने गले आगे कर दिए लेकिन इस्लाम पे ज़ख्म नहीं लगने दिया. वहां हक़ वालों ने किसी बेगुनाह कि जान ली नहीं बल्कि अपनी जान को क़ुरबान किया. वहां सब्र का मुज़ायरा किया गया. वरना इमाम हुसैन a.s. के लश्कर में ऐसे ऐसे जांबाज़ थे जो अकेले ही यज़ीद कि फ़ौज को ख़त्म कर सकते थे. लेकिन वहां मक़सद अपनी ताक़त और कुव्वत का मुज़ायरा करना नहीं था. बल्कि अपने किरदार को पेश करने का था, ताकि आने वाली नस्लें उनके इस अमल से हक़-ओ बतील का फैसला कर सकें. वहां ये बात बताई गयीं कि तमाम ताक़त और कुव्वत होने के बावजूद कैसे सब्र किया जाता है और कैसे एक नेक मक़सद के लिए अपने क़िरदार को पेश किया जाता है.

लेकिन आज अफ़सोस है की मुसलमां ख़ुद कर्बला को अपना मेयार नहीं बना रहा है. अगर मुस्लमान कर्बला का अस्ल मक़सद समझता तो आज ये दौर ना आता कि इस्लाम का नाम सुनकर दूसरों को खौफ़ आ जाये. बल्कि अगर तमाम मुसलमां कर्बला के अस्ल मक़सद को समझते तो आज शायद ही इस दुनिया में कोई गैर मुस्लिम होता. क्यूंकि कर्बला का पैगाम ज़मीनों पे हुकूमत करने का नहीं है बल्कि दिलों पे हुकूमत करने का है. और अगर इन्सान के सीने में दिल है तो वो कर्बला के वाक़ेयात सुनने के बाद ख़ुद को इमाम हुसैन a.s. के ग़म में शरीक़ करेगा. आज ज़रूरत है दुनिया को कर्बला कि तालीम देने कि. दुनिया को इमाम हुसैन a.s. और उनके कुनबे कि अज़ीम कुर्बानियों का इल्म देने का वक़्त है, क्यूंकि कर्बला इस्लाम के पास वो वाहिद सहारा है जो इस दुनिया के हर इंसान को उसके करीब ला सकता है. इसमें किसी से कोई इख्तेलाफ नहीं किया गया है. अभी भी वक़्त है कि तमाम मुसलमां कर्बला का सहारा लें और पैगाम-ए-हुसैन a.s. को आम करें. क्युंकी इमाम हुसैन a.s. ने सिर्फ इस्लाम को ही ज़िन्दगी नहीं दी, बल्कि इस पूरी इंसानियत को नयी हयात बक्षी है .



शाह अस्त हुसैन बादशाह अस्त हुसैन

दीन अस्त हुसैन दीन पनाह अस्त हुसैन

सर दाद न दाद दस्त दर दस्ते यज़ीद

हक्क़ा के बिना-ए-ला इला अस्त हुसैन

(ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी r.a.)

--जलाल काज़िम

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